श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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सारग महला ५ ॥ प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥ कवन मूल ते मानुखु करिआ इहु परतापु तुहारा ॥१॥ रहाउ ॥ जीअ प्राण सरब के दाते गुण कहे न जाहि अपारा ॥ सभ के प्रीतम स्रब प्रतिपालक सरब घटां आधारा ॥१॥ कोइ न जाणै तुमरी गति मिति आपहि एक पसारा ॥ साध नाव बैठावहु नानक भव सागरु पारि उतारा ॥२॥५८॥८१॥ {पन्ना 1220}

शब्दार्थ: प्रभ = हे प्रभू! मोहि = मैं। मोहि कवनु = मैं कौन हँ? मेरी कोई बिसात नहीं। अनाथु = यतीमं ते = से। मूल = आदि। करिआ = बनाया। तुहारा = तुम्हारा।1। रहाउ।

जीअ = जिंद। दाते = हे देने वाले! अपारा = अ+पार, बेअंत। प्रीतम = हे प्रीतम! स्रब प्रतिपालक = हे सबकी पालना करने वाले! घटां = शरीरों का। आधारा = आसरा।1।

गति = ऊँची आत्मिक अवस्था। मिति = माप। तुमरी गति मिति = तू कैसा है और कितना बड़ा है, ये बात। आपहि = तू स्वयं ही। पसारा = जगत खिलारा। नाव = बेड़ी। भव सागरु = संसार समुंद्र।2।

सरलार्थ: हे प्रभू जी! (तेरी मेहर के बिना) मेरी कोई बिसात नहीं, मैं तो बेचारा अनाथ ही हूँ। किस मूल से (एक बूँद से) तूने मुझे मनुष्य बना दिया, यह तेरा ही प्रताप है।1। रहाउ।

हे जिंद देने वाले! हे प्राण दाते! हे सब पदार्थ देने वाले! तेरे गुण बेअंत हैं, बयान नहीं किए जा सकते। हे सब जीवों के प्व्यारे! हे सबके पालनहार! तू सब शरीरों को आसरा देता है।1।

हे प्रभू! तू कैसा है और कितना बड़ा है- कोई जीव यह नहीं जान सकता। तू स्वयं इस जगत-पसारे को पसारने वाला है। हे नानक! (कह- हे प्रभू!) मुझे साध-संगति की बेड़ी में बैठा और संसार-समुंद्र से पार लंघा दे।2।58।81।

सारग महला ५ ॥ आवै राम सरणि वडभागी ॥ एकस बिनु किछु होरु न जाणै अवरि उपाव तिआगी ॥१॥ रहाउ ॥ मन बच क्रम आराधै हरि हरि साधसंगि सुखु पाइआ ॥ अनद बिनोद अकथ कथा रसु साचै सहजि समाइआ ॥१॥ करि किरपा जो अपुना कीनो ता की ऊतम बाणी ॥ साधसंगि नानक निसतरीऐ जो राते प्रभ निरबाणी ॥२॥५९॥८२॥ {पन्ना 1220}

शब्दार्थ: वडभागी = बड़े भाग्यों वाला मनुष्य (ही)। किछु होरु = कोई और (उपाय)। अवरि = और (बहुवचन)। उपाव = (शब्द 'उपाउ' का बहुवचन) यतन। अवरि उपाव = और उपाय। तिआगी = छोड़ देता है।1। रहाउ।

बच = वचन। क्रम = कर्म। साध संगि = गुरू की संगति में। अनद बिनोद = आत्मिक आनंद और खुशियां। अकथ = जिसका स्वरूप बयान ना किया जा सके। अकथ कथ रसु = अकथ प्रभू के सिफतसालाह का स्वाद। साचै = सदा स्थिर प्रभू में। सहजि = आत्मिक अडोलता में।1।

करि = कर के। जो = जिस मनुष्य को। ता की = उस मनुष्य की। ऊतम बाणी = ऊँची शोभा। निसतरीअै = पार लांघा जाता है। जो = जो (संतजन)। निरबाणी = वासना रहित, निर्लिप। राते = रंगे हुए।2।

सरलार्थ: हे भाई! कोई बड़े भाग्यों वाला मनुष्य ही परमात्मा की शरण आता है। एक परमात्मा की शरण के बिना वह मनुष्य कोई और उपाय नहीं जानता। वह और सारे तरीके त्याग देता है।1। रहाउ।

हे भाई! (प्रभू की शरण आने वाला मनुष्य) अपने से वचन से काम से परमात्मा की ही आराधना करता है। वह गुरू की संगति में टिक के आत्मिक आनंद पाता है। (उसके हृदय में) आत्मिक आनंद व खुशियां बनी रहती हैं। वह अकथ प्रभू की सिफतसालाह का स्वाद (लेता रहता है)। वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले प्रभू में और आत्मिक अडोलता में लीन रहता है।1।

हे भाई! (प्रभू) मेहर करके जिस मनुष्य को अपना (सेवक) बना लेता है, उसकी ऊँची शोभा होती है। हे नानक! जो साध-जन निर्लिप प्रभू (के प्रेम-रंग) में रंगे रहते हैं उनकी संगति में (रहने से संसार-समुंद्र से) पार लांघा जाता है।2।59।82।

सारग महला ५ ॥ जा ते साधू सरणि गही ॥ सांति सहजु मनि भइओ प्रगासा बिरथा कछु न रही ॥१॥ रहाउ ॥ होहु क्रिपाल नामु देहु अपुना बिनती एह कही ॥ आन बिउहार बिसरे प्रभ सिमरत पाइओ लाभु सही ॥१॥ जह ते उपजिओ तही समानो साई बसतु अही ॥ कहु नानक भरमु गुरि खोइओ जोती जोति समही ॥२॥६०॥८३॥ {पन्ना 1220}

शब्दार्थ: जा ते = जब से। साधू = गुरू। गही = (मैंने) पकड़ी है। सहजु = आत्मिक अडोलता। मनि = मन में। प्रगासा = (आत्मिक जीवन की) रोशनी। बिरथा = व्यथा, पीड़ा, दुख दर्द।1। रहाउ।

क्रिपाल = दयावान। कही = कही है। आन = अन्य। बिसरे = भूल गए हैं। सिमरत = सिमरते हुए। सही = ठीक, असल।1।

जह ते = जहाँ से, जिस प्रभू से। तही = वहीं। समानो = लीन हो गया। साई = वही (स्त्री लिंग)। बसत्र = चीज़, नाम पदार्थ। अही = चाही है, तमन्ना रखी है। गुरि = गुरू ने। भरमु = भटकना। खोइओ = दूर कर दी है। जोति = (मेरी) जिंद। जोती = प्रभू की जोति में। समही = लीन रहती है।2।

सरलार्थ: हे भाई! जब से (मैंने) गुरू का पल्ला पकड़ा है, (मेरे) मन में शांति और आत्मिक अडोलता पैदा हो गई है, (मेरे) मन में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो गया है, (मेरे मन में) कोई दुख-दरद नहीं रह गया।1। रहाउ।

हे भाई! जब से मैं गुरू के दर पर आया हूँ तब से (प्रभू दर पर) यही अरदास करता रहता हूँ- 'हे प्रभू! दयावान हो, मुझे अपना नाम बख्श'। हे भाई! प्रभू का सिमरने से और और व्यवहारों में मेरा मन खचित नहीं होता (और-और व्यवहार मुझे भूल गए हैं)। मैंने असल कमाई कर ली है।1।

हे नानक! कह- हे भाई! गुरू ने (मेरे मन की) भटकना दूर कर दी है, मेरी जिंद प्रभू की जोति में लीन रहती है। जिस प्रभू से ये जिंदड़ी पैदा हुई थी उएसी में टिकी रहती है, मुझे अब यह (नाम-) वस्तु ही अच्छी लगती है।2।60।83।

सारग महला ५ ॥ रसना राम को जसु गाउ ॥ आन सुआद बिसारि सगले भलो नाम सुआउ ॥१॥ रहाउ ॥ चरन कमल बसाइ हिरदै एक सिउ लिव लाउ ॥ साधसंगति होहि निरमलु बहुड़ि जोनि न आउ ॥१॥ जीउ प्रान अधारु तेरा तू निथावे थाउ ॥ सासि सासि सम्हालि हरि हरि नानक सद बलि जाउ ॥२॥६१॥८४॥ {पन्ना 1220}

शब्दार्थ: रसना = जीभ से। को = का। जसु = सिफत सालाह। गाउ = गाया करो। आन = अन्य। बिसारि = भुला के। नाम सुआउ = नाम का स्वाद।1। रहाउ।

बसाइ = टिकाए रख। हिरदै = हृदय में। सिउ = साथ। लिव = लगन। होहि = तू हो जाएगा। निरमलु = पवित्र जीवन वाला। बहुड़ि = बार बार।1।

जीउ = जिंद। अधारु = आसरा। थाउ = जगह, सहारा। सासि सासि = हरेक सांस के साथ। समालि = संभाल के, याद कर के। सद = सदा। बलि जाउ = मैं सदके जाता हूँ।2।

सरलार्थ: हे भाई! (अपनी) जीभ से परमात्मा की सिफतसालाह गाया कर। (नाम के बिना) और सारे स्वाद भुला दे, (परमात्मा के) नाम का स्वाद (सब स्वादों से) अच्छा है।1। रहाउ।

हे भाई! परमात्मा के सुंदर चरण (अपने) हृदय में टिकाए रख, सिर्फ परमात्मा से सुरति जोड़े रख। साध-संगति में रहके पवित्र जीवन वाला हो जाएगा, बार-बार जूनियों में नहीं आएगा।1।

हे नानक! (कह-) हे हरी! मेरी जिंद और प्राणों को तेरा ही आसरा है, जिसका और कोई सहारा ना हो, तू उसका सहारा है। हे हरी! मैं तो अपनी हरेक सांस के साथ तुझे याद करता हूँ, और तुझ पर से बलिहार जाता हूँ।2।61।84।

सारग महला ५ ॥ बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥ मुकति पदारथु साधू संगति अम्रितु हरि का नाउ ॥१॥ रहाउ ॥ ऊतम कथा सुणीजै स्रवणी मइआ करहु भगवान ॥ आवत जात दोऊ पख पूरन पाईऐ सुख बिस्राम ॥१॥ सोधत सोधत ततु बीचारिओ भगति सरेसट पूरी ॥ कहु नानक इक राम नाम बिनु अवर सगल बिधि ऊरी ॥२॥६२॥८५॥ {पन्ना 1220}

शब्दार्थ: नित = सदा। धिआउ = ध्याऊँ, मैं ध्यान धरता हूँ। साधू संगति = गुरू की संगति। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला जल।1। रहाउ।

सुणीजै = सुन सकें। स्रवणी = कानों से। मइआ = दया, मेहर। भगवान = हे भगवान! आवत जात दोऊ पख = पैदा होना और मरना ये दोनों पक्ष। पूरन = पूरे हो जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। सुख बिस्राम = सुखों का ठिकाना।1।

सोधत सोधत = विचार करते करते। ततु = अस्लियत। सरेसट पूरी = श्रेष्ठ पूर्ण, पूरी तरह से अच्छी। ऊरी = ऊणी, कमी बेशी।2।

सरलार्थ: हे भाई! मैं तो सदा परमात्मा के चरणों का ध्यान धरता हूँ- (यह मेरे लिए) बैकुंठ है। गुरू की संगति में टिके रहना - (मेरे लिए चारों पदार्थों में से श्रेष्ठ) मुक्ति पदार्थ है। परमात्मा का नाम ही (मेरे लिए) आत्मिक जीवन देने वाला जल है।1। रहाउ।

हे भगवान! (मेरे पर) मेहर कर, (ताकि) तेरी उक्तम सिफॅतसालाह कानों से सुनी जा सके। हे भाई! (सिफतसालाह की बरकति से) पैदा होना और मरना- ये दोनों पक्ष खत्म हो जाते हैं। सुखों के मूल परमात्मा के साथ मिलाप हो जाता है।1।

हे नानक! कह- हे भाई! विचार करते-करते ये अस्लियत मिली है कि परमात्मा की भक्ति ही पूरी तरह से उक्तम (क्रिया) है। परमात्मा के नाम के बिना और हरेक (जीवन-) ढंग अधूरा है।2।62।85।

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