श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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सोरठि महला ५ ॥ परमेसरि दिता बंना ॥ दुख रोग का डेरा भंना ॥ अनद करहि नर नारी ॥ हरि हरि प्रभि किरपा धारी ॥१॥ संतहु सुखु होआ सभ थाई ॥ पारब्रहमु पूरन परमेसरु रवि रहिआ सभनी जाई ॥ रहाउ ॥ धुर की बाणी आई ॥ तिनि सगली चिंत मिटाई ॥ दइआल पुरख मिहरवाना ॥ हरि नानक साचु वखाना ॥२॥१३॥७७॥ {पन्ना 628}

शब्दार्थ: परमेसरि = परमेश्वर ने। बंना = रुकावट खड़ी करनी, बाँध लगाना। भंना = तोड़ दिया। करहि = करने हैं। नर नारी = (वह सारे) जीव। प्रभि = प्रभू ने।1।

रवि रहिआ = मौजूद है। सभनी जाई = सब जगहों पर। रहाउ।

धुर की बाणी = परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी। आई = आ बसी। तिनि = उस (मनुष्य) ने। साचु = सदा-स्थिर प्रभू का नाम। वखाना = उचारा।2।

सरलार्थ: हे संत जनो! (जिस मनुष्य को ये यकीन हो जाता है कि) पारब्रहम पूरन परमेश्वर हर जगह पर मौजूद है (उस मनुष्य को) सब जगहों में सुख ही प्रतीत होता है। रहाउ।

हे संत जनो! (जिस मनुष्य के आत्मिक जीवन के लिए) परमेश्वर ने (विकारों के रास्ते पर) रुकावट खड़ी कर दी, (उस मनुष्य के अंदर से) परमेश्वर ने दुखों और रोगों का डेरा ही खत्म कर दिया। जिन जीवों पर प्रभू ने (ये) कृपा कर दी वे सारे जीव आत्मिक आनंद पाते हैं।1।

हे संत जनो! परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी जिस मनुष्य के अंदर आ बसी, उसने अपनी सारी चिंता दूर कर ली। हे नानक! दया का श्रोत प्रभू उस मनुष्य पर मेहरवान हुआ रहता है, वह मनुष्य उस सदा कायम रहने वाले प्रभू का नाम (हमेशा) उचारता है।2।13।77।

सोरठि महला ५ ॥ ऐथै ओथै रखवाला ॥ प्रभ सतिगुर दीन दइआला ॥ दास अपने आपि राखे ॥ घटि घटि सबदु सुभाखे ॥१॥ गुर के चरण ऊपरि बलि जाई ॥ दिनसु रैनि सासि सासि समाली पूरनु सभनी थाई ॥ रहाउ ॥ आपि सहाई होआ ॥ सचे दा सचा ढोआ ॥ तेरी भगति वडिआई ॥ पाई नानक प्रभ सरणाई ॥२॥१४॥७८॥ {पन्ना 628}

शब्दार्थ: अैथै = इस लोक में। ओथै = परलोक में। दइआला = दया करने वाला। घटि घटि = हरेक शरीर में। सबदु = बचन, बोल। सुभाखे = अच्छी तरह बोल रहा है।1।

बलि जाई = मैं सदके जाता हूँ। रैनि = रात। सासि सासि = हरेक सांस के साथ। समाली = मैं याद करता हूँ। सभनी थाई = सब जगहों में। पूरन = व्यापक। रहाउ।

सहाई = मददगार। सचे दा = सदा कायम रहने वाले परमात्मा का। सचा = सदा कायम रहने वाला। ढोआ = तोहफा, बख्शिश। वडिआई = शोभा, सिफत सालाह। प्रभ = हे प्रभू!।2।

सरलार्थ: हे भाई! मैं (अपने) गुरू के चरणों से सदके जाता हूँ, (गुरू की कृपा से ही) मैं (अपने) हरेक सांस के साथ दिन रात (उस परमात्मा को) याद करता रहता हूँ जो सब जगहों में भरपूर है। रहाउ।

हे भाई! गुरू प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है, (शरण आए की) इस लोक और परलोक में रक्षा करने वाला है। (हे भाई! प्रभू) अपने सेवकों की स्वयं रक्षा करता है (सेवकों को ये भरोसा रहता है कि) प्रभू हरेक शरीर में (स्वयं ही) बचन बिलास कर रहा है।1।

(हे भाई! गुरू की कृपा से) परमात्मा स्वयं मददगार बनता है (गुरू की मेहर से) सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की सदा स्थिर रहने वाली सिफत सालाह की दाति मिलती है।

हे नानक! (कह–) हे प्रभू! (गुरू की कृपा से) तेरी शरण में आने से, तेरी भक्ति, तेरी सिफत सालाह प्राप्त होती है।2।14।78।

सोरठि महला ५ ॥ सतिगुर पूरे भाणा ॥ ता जपिआ नामु रमाणा ॥ गोबिंद किरपा धारी ॥ प्रभि राखी पैज हमारी ॥१॥ हरि के चरन सदा सुखदाई ॥ जो इछहि सोई फलु पावहि बिरथी आस न जाई ॥१॥ रहाउ ॥ क्रिपा करे जिसु प्रानपति दाता सोई संतु गुण गावै ॥ प्रेम भगति ता का मनु लीणा पारब्रहम मनि भावै ॥२॥ आठ पहर हरि का जसु रवणा बिखै ठगउरी लाथी ॥ संगि मिलाइ लीआ मेरै करतै संत साध भए साथी ॥३॥ करु गहि लीने सरबसु दीने आपहि आपु मिलाइआ ॥ कहु नानक सरब थोक पूरन पूरा सतिगुरु पाइआ ॥४॥१५॥७९॥ {पन्ना 628}

शब्दार्थ: सतिगुर भाणा = गुरू को अच्छा लगा। ता = तब। रमाणा = राम का। प्रभि = प्रभू ने। पैज = लाज।1।

सुखदाई = सुख देने वाले। इछहि = इच्छा करते हैं। बिरथी = खाली, व्यर्थ।1। रहाउ।

प्रानपति = प्राण का मालिक। ता की = उस (मनुष्य) की। लीणा = मस्त। पारब्रहम मनि = पारब्रहम के मन में। भावै = प्यारा लगने लग जाता है।2। रवणा = सिमरन करना। जसु रवणा = सिफत सालाह करनी। बिखै ठगउरी = विषय विकारों की ठॅगबूटी। संगि = साथ। करतै = करतार ने। साथी = मददगार, संगी।3।

करु = हाथ (एक वचन)। गहि = पकड़ के। सरबसु = (सर्वस्व) सब कुछ। आपहि = खुद ही। आपु = अपना आप। थोक = पदार्थ, काम।4।

सरलार्थ: हे भाई! परमात्मा के चरण सदा सुख देने वाले हैं। (जो मनुष्य हरी के चरणों का आसरा लेते हैं, वह) जो कुछ (परमात्मा से) मांगते हैं वही फल प्राप्त कर लेते हैं। (परमात्मा की सहायत पर रखी हुई कोई भी) आस ख़ाली नहीं जाती।1। रहाउ।

(पर, हे भाई!) जब गुरू को अच्छा लगता है (जब गुरू प्रसन्न होता है) तब ही परमात्मा का नाम जपा जा सकता है। परमात्मा ने मेहर की (गुरू मिलाया! गुरू की कृपा से हमने नाम जपा, तो) परमात्मा ने हमारी लाज रख ली (विष ठॅग बूटी से बचा लिया)।1।

हे भाई! जीवन का मालिक दातार प्रभू जिस मनुष्य पर मेहर करता है वह संत (स्वभाव बन जाता है, और) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है। उस मनुष्य का मन परमात्मा की प्यार भरी भक्ति में मस्त हो जाता है, वह मनुष्य परमात्मा को (भी) प्यारा लगने लगता है।2।

हे भाई! आठों पहर (हर समय) परमात्मा की सिफत सालाह करने से विकारों की ठॅगबूटी का असर खत्म हो जाता है (जिस मनुष्य ने सिफत सालाह में मन जोड़ा) ईश्वर ने (उसको) अपने साथ मिला लिया, संत जन उसके संगी-साथी बन गए।3।

(हे भाई! गुरू की शरण पड़ कर जिस भी मनुष्य ने प्रभू-चरणों की आराधना की) प्रभू ने उसका हाथ पकड़ के उसको सब कुछ बख्श दिया, प्रभू ने उसको अपना आप ही मिला दिया। हे नानक! कह–जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल गया, उसके सारे काम सफल हो गए।4।15।79।

सोरठि महला ५ ॥ गरीबी गदा हमारी ॥ खंना सगल रेनु छारी ॥ इसु आगै को न टिकै वेकारी ॥ गुर पूरे एह गल सारी ॥१॥ हरि हरि नामु संतन की ओटा ॥ जो सिमरै तिस की गति होवै उधरहि सगले कोटा ॥१॥ रहाउ ॥ संत संगि जसु गाइआ ॥ इहु पूरन हरि धनु पाइआ ॥ कहु नानक आपु मिटाइआ ॥ सभु पारब्रहमु नदरी आइआ ॥२॥१६॥८०॥ {पन्ना 628}

शब्दार्थ: गरीबी = विनम्र स्वभाव। गदा = गुरज। खंना = खंडा। रेनु = चरण धूड़। छारी = छार, मिट्टी। न टिकै = खड़ा नहीं हो सकता। वेकारी = कुकर्मी। सारी = समझाई।1।

ओटा = आसरा।

तिस की: ‘तिसु’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हट गई है।

गति = ऊँची आत्मिक अवस्था। उधरहि = (विकारों से) बच जाते हैं। कोटा = करोड़ो ही।1। रहाउ।

संगि = संगति में। जसु = सिफत सालाह के गीत। आपु = स्वैभाव। सभु = हर जगह। नदरी आइआ = दिखा।2।

सरलार्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम संत जनों का आसरा है। जो भी मनुष्य (परमात्मा का नाम) सिमरता है, उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। (नाम की बरकति से) सारे करोड़ों ही जीव (विकारों से) बच जाते हैं।1। रहाउ।

हे भाई! विनम्रता भरा स्वभाव हमारी गदा है, सबकी चरण-धूड़ बने रहना हमारे पास खंडा हैं इस (गदा) के आगे इस (खंडे) के आगे कोई भी कुकर्मी टिक नहीं सकता। (हमें) पूरे गुरू ने ये बात समझा दी है।1।

हे नानक! कह– जिस मनुष्य ने संत जनों की संगति में (बैठ के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए हैं, उसने ये हरी-नाम धन प्राप्त कर लिया है जो कभी खत्म नहीं होता। उस मनुष्य ने (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया है उसे हर जगह परमात्मा ही (बसता) दिख गया है।2।16।80।

सोरठि महला ५ ॥ गुरि पूरै पूरी कीनी ॥ बखस अपुनी करि दीनी ॥ नित अनंद सुख पाइआ ॥ थाव सगले सुखी वसाइआ ॥१॥ हरि की भगति फल दाती ॥ गुरि पूरै किरपा करि दीनी विरलै किन ही जाती ॥ रहाउ ॥ गुरबाणी गावह भाई ॥ ओह सफल सदा सुखदाई ॥ नानक नामु धिआइआ ॥ पूरबि लिखिआ पाइआ ॥२॥१७॥८१॥ {पन्ना 628}

शब्दार्थ: गुरि पूरै = पूरे गुरू ने। पूरी कीनी = पूरी कृपा की। बखस = दाति, बख्शिश, भक्ति की दाति। नित = सदा। थाव = (‘थाउ’ का बहुवचन)। सगले = सारे। थाव सगले = सारी जगहें, सारी इन्द्रियां।1।

फल दाती = फल देने वाली। किन ही = किनि ही, किसी ने ही (‘किनि’ में ‘नि’ की ‘ि’ की मात्रा क्रिया विषोशण ‘ही’ के कारण हट गई है)। रहाउ।

गवह = आओ हम गाएं। ओह = वह गुरबाणी। पूरबि = पूर्बले जनम में।2।

सरलार्थ: हे भाई! परमात्मा की भक्ति सारे फल देने वाली है। पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर कर दी (उसने प्रभू की भक्ति करनी आरम्भ कर दी। पर, हे भाई!) किसी दुर्लभ मनुष्य ने ही परमात्मा की भक्ति की कद्र समझी है। रहाउ।

हे भाई! जिस मनुष्य पर पूरे गुरू ने पूरी कृपा की, उसको गुरू ने अपने दर से प्रभू की भक्ति की दाति दे दी। वह मनुष्य सदा आत्मिक आनंद लेने लग पड़ा। गुरू ने उसकी सारी ज्ञानेन्द्रियों को (विकारों से बचा के) शांति में टिका दिया।1।

हे भाई! आओ हम भी गुरू की बाणी गाया करें। गुरू की बाणी सदा ही सारे फल देने वाली सुख देने वाली है। हे नानक! (कह–) (उसी मनुष्य ने गुरबाणी के द्वारा परमात्मा का) नाम सिमरा है जिसने पूर्बले जनम में लिखा भक्ति का लेख प्राप्त किया है।2।17।81।

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